Tuesday, January 24, 2017

गम


शाम के साए बढ़ रहे थे ..डूबते सूरज की किरणों ने आसमान का
 किनारा नारंगी बना रखा था ..परिंदों को अपने अपने ठिकानो पर
 पहुचने की जल्दी थी ..काश मै भी एक परिंदा होती हर फ़िक्र और
 गम से आज़ाद, खुले आसमान में उडती फिरती 





रंजो गम का सूरज ढलता ही नही

अब मंजर ये दर्द का बदलता ही नही


यहाँ हर सू है दर्दो गम के अँधेरे

कोई रोशन चराग जलता ही नही


नए तूफान का आगाज़ है शायद


ये कैसा मौसम है जो टलता ही नही






 

Thursday, December 15, 2016

जिंदगी

जिंदगी मेरी अब सजा हो गई
मौत भी मुझसे बेवफा हो गई
पैगाम अब तक न उनका आया कोई 
जाने हमसे क्या खता हो गई
रंजो गम फैला है इन हवाओं में
क्यूँ हमसे खफा ये सबा हो गई
खामोश बैठे है महफ़िल में इस तरह 
शामे मेरी भी अब बेसदा हो गई
भटकते कदमों की आरही है सदा
उनकी आवारगी की इन्तिहाँ हो गई

Thursday, November 6, 2014

वफा जिसने भी अपनाई है







वफा  जिसने  भी   अपनाई है
यही चोट  उस ने भी खाई है
 
मेरे जख्म खुलने लगे है अब
चमन में ये कैसी बहार आई है
 
खुशी के  एहसास  हवा होगये
गमो  से मेरी  यूँ शानासाई है
 
तमाशे अब और क्या देखने है
क्या मेरी नजर ही तमाशाई है
 
आज धड़कता है दिल तेजी से
फिर बेवजह याद तेरी आई है