हर रोज नए ख्वाब के इशारे
ये मुहब्बत के है झूठे सहारे
हम न जीते तो क्या हुआ
बाजी तो दिल की तुम भी हारे
शब का रास्ता पूछने वाले
नजाने कैसे अपना दिन गुजारे
झूठ है वो जो हम समझते है
कर्ज वफा के है तुमने उतारे
( 14/2/2010-अनु)
Posted via email from धड़कन
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