Monday, August 30, 2010

कितने चुपचाप से लगते है शजर शाम के बाद


उसने देखा न कभी एक नजर शाम के बाद
कितने चुपचाप से लगते है शजर शाम के बाद

गर जानना हो हाले दिल मेरा ऐ सनम
देखना चाँद के दर्पण में मुझे शाम के बाद

इतने चुप की रास्ते को भी नहीं याद होगा
छोड देगे किसी रोज ये नगर शाम के बाद

शाम से पहले मस्त परिंदे अपनी उड़ानों में
छुप जाते है इन धोसलो में वो शाम के बाद

तुमने सूरज कभी देखा नहीं इस रात का दर्द
कितने बेरंग से लगते हैं शहर शाम के बाद

लौट के आएगा वो जरूर किसी रोज ‘अनु’
आस पर खोल के रखते है दर शाम के बाद





5 comments:

  1. हर सुबह, हर दोपहर एक हसरत जीती रही,
    नजर आप आती जी भर, शाम के बाद।

    ReplyDelete
  2. तुमने सूरज कभी देखा नहीं इस रात का दर्द
    कितने बेरंग से लगते हैं शहर शाम के बाद


    kya likh diya !!!!!!! dil bhar gaya
    bahut achchha aur bahut hee achchha likha hai

    ReplyDelete
  3. meri najaron se dekhana khud ko
    kitani khubsurat hai shahar sham ke bad

    ReplyDelete
  4. बहुत बढ़िया ....

    ReplyDelete

यूँ चुप न रहिये ... कुछ तो कहिये