Sunday, November 25, 2012

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

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तुम इल्जाम मुझ पर न लगाओ ऐसे

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

 

मेरा जिगर तार तार हुआ है कई बार

की   दिल पर   न चोट   लगाओ ऐसे 

 

कुछ रंज मुझको पहले ही घेरे हुए है

तुम मुझको हर बार न सताओ ऐसे

 

शबो रोज याद कर के उस बेवफा को

अब चैन दिल का न तुम गवाओ ऐसे

 

कहा जाऊ मै अपना जख्मे जिगर लेके

कि खुद को मै दुनिया से छिपाऊ कैसे

5 comments:

  1. कहीं आप और हम 'मक्खी' तो नहीं - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह ... बेहतरीन

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  3. तुम इल्जाम मुझ पर न लगाओ ऐसे

    दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

    Bahut Khub

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