Sunday, April 6, 2014

होने लगा

 

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सहने गुलशन पे खिजाओं का असर होने लगा

अब तेरा    गम भी    मेरा हमसफर    होने लगा

 

बेसहारों को    सहारा दिया   जिसने   कल तक

क्या सितम आज खुद वो दरबदर होने लगा

 

हौले हौले    उनके रगों मे    सनसनाहट आई

नफ़रतों के जहर का ऐसा असर होने लगा

 

थे   दरों दीवार    उसके खंडहर   की तरह

धीरे धीरे बे लबादा हर शजर होने लगा

 

मेरे उजड़ने   की जब   कहानी सुनी   उसने

आंसुओं से चेहरा उसका तरबतर होने लगा

अनु -29/3/2014

4 comments:

  1. लाजवाब शेर हैं ..
    बेसहारों को सहारा दिया जिसने कल तक
    क्या सितम आज खुद वो दरबदर होने लगा ..
    हकीकत लिए ये शेर खास लगा ...

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उपलब्धि और आलोचना - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बेसहारों को सहारा दिया जिसने कल तक

    क्या सितम आज खुद वो दरबदर होने लगा

    bahut khub...keep writing...

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