Monday, December 31, 2012

धुँआ धुँआ

 

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धुँआ धुँआ है जिंदगी,धुँआ धुँआ है समां

आँखों में छाई ऐसी नमी खो गया जहां 

 

तुम ही कहो कैसे जिए ये चाक गिरेबा कैसे सीए

रहते है साथ साथ मगर , फासले है दरमियां

 

प्यारा ये चेहरा तेरा,तू धड़कन कि तमन्ना है

बस तुही रहे सामने चाहे छूट जाये ये कारवां

 

बेजान जिस्म, जख्मी रूह और दिल है परेशां

ऐसे में अब इस दिल को सब्र आएगा कहां

 

 कैसे यकीं करू की सनम तुम हो बेवफा

अब ओर न लो तुम मेरे इश्क का इम्तहां

12 comments:

  1. बेजान जिस्म, जख्मी रूह और दिल है परेशां
    ऐसे में अब इस दिल को सब्र आएगा कहां
    सच कहा ....

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  2. दिल की तड़प ....बहुत ही अच्छी ....

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  3. बेजान जिस्म, जख्मी रूह और दिल है परेशां
    ऐसे में अब इस दिल को सब्र आएगा कहां ...

    सच कहा है ... इस तड़प ओर बैचेनी का इलाज समझ नहीं आता ..
    २०१३ की मगल कामनाएं ..

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  4. मन के क्रन्दन को स्थापित करते शब्द..

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  5. मंगलवार 08/01/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं .... !!
    आपके सुझावों का स्वागत है .... !!
    धन्यवाद .... !!


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  6. तुम ही कहो कैसे जिए ये चाक गिरेबा कैसे सीए

    रहते है साथ साथ मगर , फासले है दरमियां

    सारे शेर अच्छे है.

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  7. बहुत सुन्दर !
    'दर्द ही दर्द है बिखरा हुआ ...
    समेटूँ कहाँ कहाँ ...' :(
    ~सादर!!!

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  8. बेजान जिस्म, जख्मी रूह और दिल है परेशां

    ऐसे में अब इस दिल को सब्र आएगा कहां

    wah lajabab sher

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  9. दिल से एक आह से निकली है!!
    बहुत खूब!

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  10. बहुत खूब
    शब्दों में दर्द ही दर्द

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  11. वाह क्या बात है शानदार ग़ज़ल

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