Monday, March 22, 2010

जीत क्या शय है हार कर देखो

अपनी हस्ती उजाड कर देखो

गलती ये एक बार कर देखो

 

प्यार के खेल में मेरे दिलबर    

जीत क्या शय है हार कर देखो                              

 

हमने एक उम्र काट दी जैसे

तुम एक शब् गुजार कर देखो

 

लौट आउंगी फिर से पास  तेरे

दिल से मुझको पुकार कर देखो

 

फिर बुरा नज़र न आएगा कोई  

खुद का चेहरा निखार कर देखो

                            (10/2/2010-अनु )

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Saturday, March 20, 2010

मन अब भी खोया रहता है


ये बात सपन सी लगती है
जब हम भी खुश खुश रहते थे
थे पास हमारे तब भी वो
जब ख्वाब सुनहरे सजते थे
मन खोया खोया रहता था
अरमा बेख़ौफ़ मचलते थे
है पास हमारे अब भी वो
पर तन्हा तन्हा रहते है
मन अब भी खोया रहता है
पर अरमाँ नहीं मचलते है
हम किसको ढूंढा करते है
और क्या हम ढूंढा करते है
दुनिया भर के इस मेले में
क्यों तन्हा घूमा करते है
है पास हमारे अब भी वो
(3/2/2010----अनु )

Friday, March 19, 2010

अश्क मुझे करते हैं परेशान बहुत

तुम ही थे मेरे इश्क से अनजान बहुत

वरना इस दिल में थे अरमान बहुत

 

ज़ब्त ए गम आँख को पत्थर कर दे

अश्क मुझे  करते हैं  परेशान बहुत

 

फिर से बह निकली मुहब्बत की हवा  

पर वहाँ  जज़्ब हैं  तूफ़ान बहुत

 

जी तो लेती ‘अनु’तेरे बगैर मगर

जिंदगी होती नहीं है आसान बहुत

                            (10/2/2010- अनु)

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Monday, March 15, 2010

मेरी आँखों में है खुश्क पानी सुनो

उजड़े ख्वाबो की है एक कहानी सुनो
है जो हमको तुम्ही को सुनानी सुनो

जीत पर अपनी क्यों इतना मगरूर हो
हार हमने है खुद अपनी मानी सुनो

मुझको मालूम है बाद मरने मेरे
याद सबको हमारी है आनी सुनो

मुझसे छीनो ना मेरे दुखो को सनम
जिंदगी की यही है निशानी सुनो

आँख भर आई है मेरी तेरे लिए
मेरी आँखों में है खुश्क पानी सुनो

आज मिट्टी हुए सारे अरमाँ मेरे
खुद पे चादर ग़मों की है तानी सुनो
(9/2/2010-अनु)

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Friday, March 5, 2010

जिंदगी फिर से गुनगुनाये तो अच्छा होता

फांस ये दिल से निकल जाए तो अच्छा होता

जिंदगी फिर से गुनगुनाये तो अच्छा होता


 

 

अब तो तनहाइयों की धूप से जलता है बदन

प्यार की छांव जो मिल जाए तो अच्छा होता


 

 

तमाम शब गुजर गई ग़मों की दरिया में  

तीर कश्ती को जो मिल जाए तो अच्छा होता 


 

 

कोई तो हो भी मेरी नीद की साजिश में शरीक

मेरे खवाबो की ताबीर बदल जाए तो अच्छा होता

 

                                                               (21/2/2010-अनु)

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जिंदगी फिर से गुनगुनाये तो अच्छा होता

फांस ये दिल से निकल जाए तो अच्छा होता

जिंदगी फिर से गुनगुनाये तो अच्छा होता


 

अब तो तनहाइयों की धूप से जलता है बदन

प्यार की छांव जो मिल जाए तो अच्छा होता


 

तमाम शब गुजर गई ग़मों की दरिया में  

तीर कश्ती को जो मिल जाए तो अच्छा होता 


 

कोई तो हो भी मेरी नीद की साजिश में शरीक

मेरे खवाबो की ताबीर बदल जाए तो अच्छा होता

 

                                                               (21/2/2010-अनु)

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Tuesday, March 2, 2010

हमपे करम बहुत हैं उस सितमगार के

ऐ मेरे सनम तेरी महोब्बत में हार के
यूँ ही चले जाएगे शबे गम गुजार के

है मयकदा वीरान और सागर उदास है
जाने से उनके रूठ गए दिन बहार के

हम टूट भले जाएँगे शिकवा न करेंगे
हमपे करम बहुत हैं उस सितमगार के

ख्वाबो के ही आलम में आजाये वो कभी
पलकों में पालती रही दिन इंतजार के

फिर तोड़ के दीवार अना की पुकार लो
फिर देख लूँ मै हौसले अपने भी यार के

(26/2/2010-अनु)

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