Friday, November 30, 2012

अहिस्ता आहिस्ता

 

 

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मिले जब मुझको ऐसे गम अहिस्ता आहिस्ता

हुई तब आँख मेरी पुरनम अहिस्ता आहिस्ता

छोड दिया जब साथ मेरा साये ने

नाजाने होगई कहा मै गुम अहिस्ता आहिस्ता

जुबा से तो कुछ भी निकलता नहीं

फिर भी तन्हाई गाती है हरदम अहिस्ता आहिस्ता

लहू दिल का उतर है मेरी आँख मे

युही बेवजह मुस्कुराये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता

आपकी याद है दिल का चैन जाना

पर आपको भुलाये जाते है हमदम अहिस्ता आहिस्ता

दिल में उठते गुबार से मायूस न हो

सहरा को गुलजार बनाये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता

Sunday, November 25, 2012

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

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तुम इल्जाम मुझ पर न लगाओ ऐसे

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

 

मेरा जिगर तार तार हुआ है कई बार

की   दिल पर   न चोट   लगाओ ऐसे 

 

कुछ रंज मुझको पहले ही घेरे हुए है

तुम मुझको हर बार न सताओ ऐसे

 

शबो रोज याद कर के उस बेवफा को

अब चैन दिल का न तुम गवाओ ऐसे

 

कहा जाऊ मै अपना जख्मे जिगर लेके

कि खुद को मै दुनिया से छिपाऊ कैसे

Friday, August 31, 2012

ये दिया अपने हाथो से बुझाए कैसे


  
ये जख्मे जिगर हम उठाए कैसे
तुम ही कहो अब मुस्कुराए कैसे

आते है बार बार मेरी आंख मे आंसू
हम अश्क अपने उनसे छुपाए कैसे

तेरी यादो से ही रौशन है मेरी दुनिया
ये दिया अपने हाथो से बुझाए कैसे

जुबां खुलती नही मेरी तेरी महफिल मे
इस भरे बज्म हम कोई गीत सुनाए कैसे  

Thursday, June 21, 2012

ना आया ..


कोई भी लम्हा कभी लौट कर ना आया
वो शख्स गया ऐसा फिर नजर ना आया

वफा की दश्त में कोई रस्ता ना मिला
सिवाय गर्दे सफर हम सफर ना आया
  
पलट के आने लगे शाम के परिंदे भी
मगर वो सुबह का भुला घर ना आया

किसी चराग ने पूछी नही खबर मेरी
कोई भी फुल मेरे नाम पर ना आया

ये कैसी बात कही शाम के सितारे ने
कें सकून दिल को मेरे रात भर ना आया  

Sunday, June 10, 2012

शामे मेरी भी अब बेसदा हो गई



जिंदगी मेरी  अब सजा  हो गई
मौत भी  मुझसे बेवफा  हो गई

मोहब्बत का पैगाम न आया कोई
जाने हमसे  क्या खता  हो गई

रंजो गम फैला है इन हवाओं में
क्यूँ हमसे खफा ये सबा हो गई

खामोश बैठे है महफ़िल में इस तरह 
शामे मेरी भी अब बेसदा हो गई  

भटकते कदमों की आरही है सदा
उनकी आवारगी की इन्तिहाँ हो गई
                           (अनु -20/5/2012)

Wednesday, March 28, 2012

सूखे हुए पत्ते

imagesरोज जीते है यूँ रोज मरते है

हाले दिल उनसे कहते डरते है

हम तो सूखे हुए पत्ते की तरह

रोज ही  टूट कर  बिखरते है

उनको कब है ख्याल अपना

एक हम ही उनका दम भरते है

रोज आते है ठहरते है चले जाते है

काफिले यादों के पलको में उतरते है

Monday, January 2, 2012

आंख शब भर मेरी लगती नहीं क्यों

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कयामत की रात ये ढलती नहीं क्यों

खिजा की रुत भी बदलती नहीं क्यों

 

क्याबतलाऊ मैं तुझको ऐ दिलबर

तन्हा रुत अब गुजरती नही क्यों

 

टुटा है जब से ख्वाब मेरी आँखों का

आंख शब भर मेरी लगती नहीं क्यों

 

अब्र आते है बरसते हैं चले जाते है

कली दिल की मगर खिलती नहीं क्यों

 

     बैठी हूँ बीच दरिया में मगर

   प्यास ये मेरी बुझती नहीं क्यों

 

               (अनु )