Saturday, April 27, 2013

आया






कभी कभी ऐसा भी होता है कि अपना दुःख हर एक के दुःख से ज्यादा महसूस होता है कि बस ख़ामोशी से अपने अंदर उतरते हुए अँधेरे को महसूस करने का मन करता है .......

हमें जिंदगी जीने का सलीका ना आया
मगर जिंदगी ने हमे हर बार आजमाया

भूल चुके जब हम सब माज़ी के किस्से
दुश्मने जां फिर मेरा दिल दुखाने आया

था साथ उसके इक नया हमसफर
होकर पराया हमसे हमको जलाने आया

Saturday, March 2, 2013

ये कैसा मौसम है जो टलता ही नही


रंजो गम का सूरज ढलता ही नही
ये दर्द का मंजर बदलता ही नही

यहाँ हर सू है दर्दो गम के अँधेरे
कोई रोशन चराग जलता ही नही 

नए तूफान का आगाज़ है शायद
ये कैसा मौसम है जो टलता ही नही 





Monday, December 31, 2012

धुँआ धुँआ

 

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धुँआ धुँआ है जिंदगी,धुँआ धुँआ है समां

आँखों में छाई ऐसी नमी खो गया जहां 

 

तुम ही कहो कैसे जिए ये चाक गिरेबा कैसे सीए

रहते है साथ साथ मगर , फासले है दरमियां

 

प्यारा ये चेहरा तेरा,तू धड़कन कि तमन्ना है

बस तुही रहे सामने चाहे छूट जाये ये कारवां

 

बेजान जिस्म, जख्मी रूह और दिल है परेशां

ऐसे में अब इस दिल को सब्र आएगा कहां

 

 कैसे यकीं करू की सनम तुम हो बेवफा

अब ओर न लो तुम मेरे इश्क का इम्तहां

Monday, December 10, 2012

याद किया



आज फिर  इस तरह  तुम्हे याद किया
हमने  अपने आप  खुद को बर्बाद किया

तब मिला मुझको मेरी वफाओं का सिला
प्यार के रिश्ते से जब तुझको आजाद किया

चार दिन की जिंदगी क्या दुश्मनी क्या रंजिशें
हमने दुश्मनों से अपनी दोस्ती को आबाद किया

उसने भी मुजरिम समझा और फेर ली आँखे
हमने तो कई बार उसके दर पर फरियाद किया

Wednesday, December 5, 2012

( गाँव की बोली)

A Village scene

दूर कही गाँव में

पीपल की छांव में

बच्चे खेल रहे है गोली

याद आती है मासूम ठिठोली

खेतों खलिहानो में

गलियों मैदानों में

दौड रही है फगुओ की टोली

याद आती है गांव की होली

तीजो त्योहारों में

गलियों चौबारो में

भाभी बनाती है रंगोली

याद आये दुल्हनियां की डोली

अमवा की डाली में

बेरी की झाडी में

लुक छिप जाते हमजोली

आज सुधि की पिटारी है खोली

Friday, November 30, 2012

अहिस्ता आहिस्ता

 

 

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मिले जब मुझको ऐसे गम अहिस्ता आहिस्ता

हुई तब आँख मेरी पुरनम अहिस्ता आहिस्ता

छोड दिया जब साथ मेरा साये ने

नाजाने होगई कहा मै गुम अहिस्ता आहिस्ता

जुबा से तो कुछ भी निकलता नहीं

फिर भी तन्हाई गाती है हरदम अहिस्ता आहिस्ता

लहू दिल का उतर है मेरी आँख मे

युही बेवजह मुस्कुराये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता

आपकी याद है दिल का चैन जाना

पर आपको भुलाये जाते है हमदम अहिस्ता आहिस्ता

दिल में उठते गुबार से मायूस न हो

सहरा को गुलजार बनाये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता

Sunday, November 25, 2012

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

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तुम इल्जाम मुझ पर न लगाओ ऐसे

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

 

मेरा जिगर तार तार हुआ है कई बार

की   दिल पर   न चोट   लगाओ ऐसे 

 

कुछ रंज मुझको पहले ही घेरे हुए है

तुम मुझको हर बार न सताओ ऐसे

 

शबो रोज याद कर के उस बेवफा को

अब चैन दिल का न तुम गवाओ ऐसे

 

कहा जाऊ मै अपना जख्मे जिगर लेके

कि खुद को मै दुनिया से छिपाऊ कैसे